एक दीप जला दे
कहूँ अब
या रहूँ चुप
पर कब तक ?
क्या प्यार की
आखरी हद तक ?
क्या शब्द नहीं मुझ पर
या साहस नहीं मुझमें
या है कमी अभी
मेरे प्यार के विश्वास में ?
या है हावी उस पर
भय जन-जन का
या है प्रेम समायाहृदय में उसके
किसी और सज्जन का
या है नहीं अनुभव उसे
निर्णय सही चुनने का
या आदि नहीं हृदय उसका
प्रेम की बातें सुनने का।
गर न है ये सच
उसके मन का
तो भाग्य नही फिर मेरा
अभी अपने श्रेष्ठ पद पर
या चूर हो जाऊँ थककर
सतत प्रेम प्रयास में
संकल्प के ह्रास में
पर आनंद के रास में।
या चढाऊँ सतत
पुष्प अपनी चाहत के
समक्ष प्रेम की मूरत के।
मंदिर में जो बसी मेरे
हृदय प्रांगण में।
या कर दूँ समर्पण
स्वमं के हृदय का
ढूंढकर लाने को
खुशी उसके दामन में
है भाग्य की देवी !
हैं उपकार कईतेरे मुझ पर
दिए जो तूने मुझे
मिलने के इतने अवसर
पर बस करना एक उपकार
अभी और मुझ पर इतना
भाग्य से उसके
मेरे भाग्य को मिला दे
प्रेम का पुष्प मेरा
हृदय में उसके खिला दे
चाहत का मेरी बस
एक दीप जला दे
एक दीप जला दे।
- बंधी जी

